देहरादून। नेपाल में 26 अगस्त 2026 को सामने आई भीषण आपदा के बाद उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर झीलों की निगरानी को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है। उत्तराखंड में सैकड़ों ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं, जिनमें से करीब 426 झीलों का क्षेत्रफल 1,000 वर्ग मीटर से अधिक है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से कई ग्लेशियर झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है, जिससे भविष्य में ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।
वैज्ञानिक लंबे समय से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित अतिसंवेदनशील और संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की नियमित निगरानी पर जोर देते रहे हैं। इसके लिए राज्य स्तर पर बजट भी उपलब्ध कराया गया है, लेकिन इसके बावजूद कई महत्वपूर्ण झीलों के लिए कंटीन्यूअस मॉनिटरिंग सिस्टम अब तक स्थापित नहीं हो पाया है। ऐसे में सवाल उठता है कि संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी में आखिर सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं और इनसे निपटने के लिए उत्तराखंड की तैयारियां कितनी प्रभावी हैं।
2013 की आपदा के बाद बढ़ा फोकस
उत्तराखंड में ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट से जुड़ी घटनाओं ने पहले भी गंभीर चिंता पैदा की है। वर्ष 2013 की केदार घाटी की आपदा के बाद ग्लेशियरों और ग्लेशियर झीलों की निगरानी को लेकर राज्य और केंद्र सरकार के स्तर पर विशेष ध्यान दिया गया। उद्देश्य यह है कि उच्च हिमालय में ग्लेशियर झीलों के आकार, जलस्तर और संभावित खतरे में होने वाले बदलावों का समय रहते वैज्ञानिक आकलन किया जा सके।
उत्तराखंड में जब भी बड़ी प्राकृतिक आपदा सामने आती है, ग्लेशियर झीलों की निगरानी का मुद्दा फिर चर्चा में आ जाता है। इसका कारण प्रदेश के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद बड़ी संख्या में ग्लेशियर झीलें हैं।
1,200 झीलों में 13 को माना गया संवेदनशील
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की वर्ष 2024 की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में करीब 1,200 ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई थी। इनमें से 13 झीलों को संवेदनशीलता के आधार पर विशेष श्रेणियों में रखा गया।
रिपोर्ट में इन झीलों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है—
- कैटेगरी A: 5 अतिसंवेदनशील ग्लेशियर झीलें
- कैटेगरी B: 4 कम संवेदनशील ग्लेशियर झीलें
- कैटेगरी C: 4 सबसे कम संवेदनशील ग्लेशियर झीलें
इन झीलों की संवेदनशीलता को देखते हुए नियमित वैज्ञानिक अध्ययन और निगरानी को महत्वपूर्ण माना गया है।
वाडिया इंस्टीट्यूट को बनाया गया नोडल संस्थान
NDMA की रिपोर्ट के बाद उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग ने अतिसंवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी को लेकर कदम उठाए। राज्य शासन ने उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद अतिसंवेदनशील और संवेदनशील ग्लेशियर झीलों के वैज्ञानिक अध्ययन एवं निगरानी के लिए वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी को नोडल संस्थान बनाया।
योजना के तहत ग्लेशियर झीलों का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन कराने के साथ-साथ भविष्य में कंटीन्यूअस मॉनिटरिंग के लिए आधुनिक उपकरण स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया था। इसका मकसद झीलों में होने वाले बदलावों की लगातार निगरानी करना और संभावित खतरे की स्थिति में समय रहते चेतावनी जारी करना है।
चार झीलों का हुआ वैज्ञानिक अध्ययन
आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से वर्ष 2024 से 2026 के बीच चार संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का बाथीमेट्री और ग्लेशियोलॉजिकल अध्ययन कराया गया। इन अध्ययनों के जरिए झीलों की गहराई, जल क्षमता, ग्लेशियर की स्थिति और उससे जुड़े संभावित खतरों का वैज्ञानिक आकलन किया जाता है।
हालांकि अध्ययन कराया जाना एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन विशेषज्ञों के लिए चुनौती अब इससे आगे की है। केवल समय-समय पर सर्वेक्षण के बजाय संवेदनशील झीलों में ऐसे उपकरण स्थापित करना जरूरी माना जाता है, जो झील के जलस्तर, तापमान, ग्लेशियर में बदलाव और अन्य महत्वपूर्ण मानकों की लगातार निगरानी कर सकें।
दुर्गम इलाकों में निगरानी सबसे बड़ी चुनौती
उत्तराखंड की अधिकांश संवेदनशील ग्लेशियर झीलें बेहद दुर्गम और ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में स्थित हैं। इन स्थानों तक पहुंचना, उपकरण स्थापित करना और उनकी नियमित देखरेख करना आसान नहीं है। अत्यधिक ठंड, बर्फबारी, खराब मौसम, संचार सुविधाओं की कमी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां निगरानी व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती हैं।
इसके अलावा स्थापित किए जाने वाले मॉनिटरिंग उपकरणों से प्राप्त आंकड़ों को लगातार किसी केंद्रीय निगरानी प्रणाली तक पहुंचाना और उनका वैज्ञानिक विश्लेषण करना भी जरूरी है। यदि किसी झील में अचानक जलस्तर या अन्य महत्वपूर्ण मानकों में बदलाव होता है तो संबंधित एजेंसियों तक तत्काल अलर्ट पहुंचाने की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
नेपाल की घटना ने फिर उठाए सवाल
नेपाल में 26 अगस्त को हुई आपदा ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों और उनसे जुड़े संभावित खतरों को लेकर चिंता फिर बढ़ा दी है। हिमालय एक साझा भौगोलिक क्षेत्र है और जलवायु परिवर्तन के कारण यहां ग्लेशियरों में लगातार बदलाव हो रहे हैं। ऐसे में उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के लिए संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी केवल वैज्ञानिक अध्ययन तक सीमित न रहकर रियल टाइम मॉनिटरिंग और प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम से जुड़ना जरूरी है।
अब चुनौती यह है कि जिन संवेदनशील झीलों की पहचान हो चुकी है, वहां निगरानी उपकरण कब तक स्थापित होते हैं और उनसे मिलने वाले वैज्ञानिक आंकड़ों को आपदा प्रबंधन की तत्काल चेतावनी प्रणाली से किस तरह जोड़ा जाता है। नेपाल की घटना के बाद यह सवाल उत्तराखंड के लिए और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
